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Monday, 20 December 2021

सिन्धु घाटी की सभ्यता

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सिन्धु घाटी की सभ्यता

परिचय- पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में उनसे को इसमें हड़प्पा और 1922 में मोहनजोदड़ो नामक नगरों का पता चला। यह दोनों नगर पाकिस्तान में है इनमें हरप्पा पश्चिमी पंजाब के मटन गुमरी जिले में तथा मोहन जोदड़ो सिंधु के लड़का ना जिले में स्थित है। इन दोनों नगरों में एक महान प्राचीन सभ्यता का पता चला है जो अब सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से विख्यात हो गई है। बाद में 1955 में लोथल गुजरात नामक स्थान पर खुदाई की गई यहां भी सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमाण जिले हैं।

भारत में सभ्यता से संबंधित स्थानों में रोपड़ तथा कालीबंगा राजस्थान के नाम भी जुड़ जाते हैं। यह सभी स्थान सिंधु नदी घाटी और उसके आसपास है। इससे पता चलता है यह सभ्यता दूर-दूर तक फैली हुई थी।
तिथि- कार्बन डेटिंग प्रोसेस द्वारा इस सभ्यता को 5000 वर्ष पूर्व माना जाता है। अत: यह 3000 बीसी से 1590 बी0सी0 प्राचीन सभ्यताओं की प्राचीन अन्य सभ्यताओं का मुकाबला कर सकती है। और इससे भी अधिक प्राचीन हो सकती है।

नगर तथा भवन निर्माण

नगर तथा भवन निर्माण- दोनों नगरों से ज्ञात हुआ है कि एक नगर दूसरे नगर के खंडहरों पर निर्मित हुआ है। हड़प्पा की खुदाई में दो चीज बड़ी आकर्षक निकली है। प्रथम तो कब्रिस्तान तथा दूसरी खटिया भंडार गृह कब्रिस्तान में एक दूसरे के ऊपर तो खाने हैं जिनमें मुर्दे गारे जाते थे।खेती में अनाज भरा जाता था। तीसरे कारीगरों के मकान भी चौक रोहतक आशु निर्मित है।उस पर पशुओं की शक्ल भी बनी हुई है mohenjodaro सुनियोजित नगर था। जिसके भवन पक्की इट्टे के बने हैं। सरके भी ठीक प्रकार से बनाई गई है। नगर के मध्य में जनता की सभा हेतु खंभों पर खड़ा एक बड़ा पुल बना है। मकानों में दरवाजे खिड़कियां व रोशनदार लगे हैं, और उनमें पक्के फर्श स्नान गृह तथा पक्की नालियां बनी हुई है। शहर के बीच पक्का ईटों का बना एक तालाब भी मिला है इसे विशाल स्नानागार कहा जाता है।

कृषि तथा उद्योग धंधे

कृषि तथा उद्योग धंधे- यह सभ्यता उस काल की है जब लोग कृषि करने लगे थे। यहां के लोग यह हूं जौ,मटर,तरबूज आदि की कृषि करते थे। वे सूती तथा उन्नी धागा तैयार करना तथा कपड़ा सुना भी जानते थे। पत्रों पर खुदाई तथा मूर्तियों से ज्ञात होता है कि स्त्रियां स्कर्ट पहनती थी और पुरुष धोती लपेट ते थे। और कंधे पर कपड़ा डालते थे। पुरुषों के दाढ़ी मूछें रखने के प्रमाण भी मिले हैं।स्त्री-पुरुष दोनों की अंगूठी गले का हार कंगन आदि सोने-चांदी, हाथी दांत, संख, हड्डी, तांबा आदि के बने पहनते थे। स्त्रियों के पास पाजेब कंधौनी, नथ आदि भी होते थे। लोग बैल, भैंस, सूअर, हाथी, कुत्ते भी पालते थे। जंगली जानवरों में उनको चीते की भी जानकारी थी। बर्तन बनाना, लकड़ी का काम, पत्थर का काम उद्योग धंदे थे। उनके हथियार धनुष,छुरी भाला कुल्हाड़ी आदि थे।

कला तथा धर्म

कला तथा धर्म- इस सभ्यता के लोगों में कला के प्रति प्रेम था। बर्तनों की चित्रकारी और आभूषणों से ज्ञात होता है कि वह पीपल देवता की पूजा करते थे। शिवजी की शक्ल की मूर्ति भी वहां पाई गई है।वे पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। उनकी सील मोहर आदि से पता चलता है कि उनकी अपनी भाषा तथा लिपि भी थी जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इन लोगों के नेता शायद व्यापारी तथा उद्योगपति थे जो व्यवहार तथा कच्चे माल की खोज में बाहर भ्रमण करने जाते थे।

सुमेरियन तथा मिस्र की सभ्यताओं में से समानता

सुमेरियन तथा मिस्र की सभ्यताओं में से समानता– सिंधु घाटी सभ्यता का का अवश्य ही सभ्यताओं से सांस्कृतिक तथा व्यापारिक संपर्क था। इसलिए इन सभ्यताओं में पक्की ईंटों, तांबे और कांसे के बर्तन बनाने के चक्र चित्रित सील आदि में समानता पाई जाती है। दोनों सभ्यताओं में व्यापार तथा नागरिक जीवन के ढंग में भी अधिक समानता मिलती है।

वैदिक सभ्यता से अंतर

वैदिक सभ्यता से अंतर- इन दोनों सभ्यताओं में अनेक अंतर दिखाई देते हैं। जैसे एक सिंधु घाटी की सभ्यता नगरीय थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी। सिंधु घाटी की सभ्यता के लोग घोरे का उपयोग नहीं जानते थे जबकि वैदिक सभ्यता के लोग इस से भलीभांति परिचित थे। सिंधु घाटी की सभ्यता के लोग कवच का उपयोग नहीं जानते थे जबकि वैदिक सभ्यता के लोग इसको जानते थे। सिंधु घाटी के लोगों को लोहे का उपयोग का ज्ञान नहीं था जबकि वैदिक सभ्यता में इसका खूब उपयोग होता था। दोनों सभ्यताओं के लोग अपने अलग-अलग देवता पूछते थे।

नवीनतम खोज

 

नवीनतम खोज- पहली खोज के अनुसार यह सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में फैली हुई मानी जाती थी, परंतु नवीनतम खोजों के आधार पर इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत माना जाता है। इसे दक्षिण में गुजरात के तटों पर फैला माना गया है। साथ ही पूर्व में उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर तक फैल माना गया है। कुछ लोगों इससे कृष्णा नदी तक फैला मानते हैं फिर भी और ठीक ही है। इसका प्रभाव बाद में क्रिष्णा नदी घाटी तक अवश्य था।

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