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Monday, 20 December 2021

जैन तथा बौध्द धर्म

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जैन तथा बौद्ध धर्म

 

जैन तथा बौद्ध धर्म- वैदिक सभ्यता में शनै:-शनै: जाति प्रथा कठोर होती गई। धर्म में बलिदान का रूप भी ब्राह्मणों द्वारा बढ़ा दिया गया। ब्राह्मणों के अधिकार भी बढ़ गए और उनके द्वारा बनाए धार्मिक रिवाज व कर्मकांड भी अत्यधिक जटिल हो गए। परिणाम स्वरुप ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दो अन्य धर्म उठकर खड़े हुए जिन्हें जैन धर्म और बौद्ध धर्म कहते हैं । इन दोनों धर्मों में कुछ समानता पाई जाती थी। यह दोनों ही ब्रह्म ब्राह्मणवाद के विरुद्ध से दोनों ही क्षत्रिय राजकुमारों द्वारा प्रतिपादित किए गए। दोनों ही वेदों को नहीं मानते थे। दोनों ही पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। दोनों का विश्वास अहिंसा में विश्वास था और बलि देने का घोर विरोध करते थे। फिर भी दोनों धर्मों में अंतर था और दोनों के मार्ग अलग-अलग थे। जैन धर्म के संस्थापक कौन थे ? इस विषय में मतभेद है कि कहा जाता तो यह जाता है कि यह धर्म के विषय में वेदों के समय इसे मान्यता है। इनके पहले तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व और निर्माण 527 ईसा पूर्व हुआ वैशाली मुजफ्फरपुर बिहार के व्यक्ति है जो जन्म से मुक्ति पा चुके हैं। उन्होंने समय-समय पर सत्य और ग्यान लोगों के समक्ष रखा है। जैन धर्म 5 पापो से दूर रहने की शिक्षा देता है। यह 5 है हिंसा, झूठ ,चूड़ी ,सुशील, परिग्रह -क्रोध।

बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म- बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुध थे जो लुंबिनी नामक नेपाल की तराई में बसी हुई है गांव में 567 ईसवी पूर्व में पैदा हुए थे। 480 पूर्व में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया । वह क्षत्रिय राजकुमार सिद्धार्थ थे जो कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के पुत्र थे । जब जीवन से विरक्ति हो गई तो उन्होंने संन्यास ले लिया और बाद में बौद्ध धर्म की नींव डाली। बौद्ध धर्म मे वेदो तथा ब्राह्मणवाद के विरुद्ध था । यह कर्म तथा निर्माण में विश्वास करता था। आत्मा के आवागमन तथा हिंसा में आस्था रखता था। इसे अपने जीवन के मध्य मार्ग का अनुसरण किया। बौद्ध धर्म के 4 महान सत्य निम्नलिखित थे। जीवन का कष्ट का दूसरा नाम है। कष्ट इच्छा से बनता होता है और असंतुष्ट इच्छा पुनर्जन्म या जीवन मरण के चक्कर में डाल देती है। इच्छा की समाप्ति से ही पुनर्जन्म की समाप्ति हो सकती है। और पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। यही सबसे महान कल्याण है जिसे निर्माण करते हैं अच्छा का सामान भावना तथा कर्म की पवित्रता द्वारा प्राप्त हो सकता है । बौद्ध धर्म के 10 उद्देश्य थे हिंसा न करना, चोरी ना करना, वेश्यावृत्ति या पर नारी से संभोग नहीं करना, झूठ नहीं बोलना, दूसरों की बुराई नहीं करना, दूसरों में दोष नहीं निकालना, गंदी भाषा का प्रयोग नहीं करना, लालच से दूर रहना, घ्रृणा से दूर रहना, अज्ञान को दूर करना।बौद्ध धर्म दूर-दूर तक फैला। इसके अनुयायी हिंदू धर्म से भी अधिक है। इसके मुख्य दो संप्रदाय महायान तथा हीनयान है। आगे चलकर बौद्ध धर्म का रूपांतरण हो गया । एक नया संप्रदाय उठ खड़ा हुआ जो महायान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसकी तुलना में मूल बौद्ध धर्म हीनयान कहलाया। महायान वालों ने बुध को देवता मान लिया तथा अनेक बुद्धि शक्तियों की कल्पना कर ली। उन्होंने यह भी मान लिया कि बुध की भक्ति करने से निर्वाण प्राप्त हो सकता है। इसलिए उन्होंने बुध की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा करनी आरंभ कर दी।महायान बौद्ध धर्म के दार्शनिकों में नागार्जुन और अशोक घोष बहुत प्रसिद्ध हुए थे।

वैष्णव धर्म

वैष्णव धर्म- वैष्णव धर्म को पहले भागवत धर्म के नाम से भी जाना जाता था। इस संप्रदाय का उद्भव उसी विचारधारा से हुआ। जिसका प्रारंभ उपनिषदों से तथा परिणीति जैन तथा बौद्ध धर्म में हुई। इसका जन्म मथुरा प्रदेश में बसने वाले यादवों की सास्वत शाखा के लोगों में हुआ। यह लोग उपनिषदों के ब्रहम वाद को स्वीकार करते हैं और हरि के नाम से उसका स्मरण करते थे। उन्होंने वेदों के यज्ञ आदि कर्म कांडों के स्थान पर भक्ति पूर्वक हरी आराधना को अधिक महत्व दिया। कहा जाता है कि वासुदेव कृष्ण ने इस आंदोलन को बहुत आगे बढ़ाया। उनके उपर नीचे उपदेश भगवत गीता में संग्रहित है । श्री कृष्ण ने उपनिषदों के ब्रह्म बाद आतंकवाद क्रमवार और पुनर्जन्म वाद को स्वीकार किया। किंतु उन्होंने न तो वैदिक कर्मकांड को तो दिया और उपनिषदों के स्वाद को ही स्वीकार किया। निष्काम कर्म उनके उपदेशों का सार है ।उन्होंने सामाजिक कल्याण के लिए धर्म का पालन करना चाहिए । उन्होंने भक्ति के महत्व को भी स्वीकार किया। श्रीकृष्ण को उन्हीं के जीवन काल में विष्णु का अवतार मान लिया गया । उनकी मूर्तियां बनाई जाने लगी। मंदिरों का निर्माण हुआ और विशाल ढंग से उनकी पूजा आराधना होने लगी। वैष्णव लोग अहिंसा पर बल देते हैं। मांस भक्षण को पाप मानते हैं और विष्णु की भक्ति को मुफ्त का परम साधन मानते हैं। अवतारों की कल्पना वैष्णव धर्म का एक महत्वपूर्ण तत्व है वैसे तो 24 अवतार माने गए हैं किंतु 10 प्रमुख है जो दशावतार के नाम से प्रसिद्ध है। यह इस प्रकार है। मत्स्य, वराह, नरसिंहवर्मन, परशुराम, राम दशरथ, कृष्ण,बुध और कल की यह विश्वास किया जाता है कि कलयुग में कल्कि का अवतार होगा।

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